मन के बाग़ में बिखरी है भावनाओं की ओस। …………कुछ बूंदें छूकर मैंने भी नम कर ली हैं हथेलियाँ …………और लोग मुझे कवि समझने लगे!

मेरे सपनों की जान

मुझ पे अब मेहरबान हो कोई
मेरे सपनों की जान हो कोई
मेरे दिल में उतर-उतर जाये
जैसे बंसी की तान हो कोई

6 comments:

pankajrago said...

Nice poem ear but why u not give this link direct y u written first another link

अविनाश वाचस्पति said...

आपकी सभी काव्‍य रचनाएं मन को छू लेती हैं।

जुटे रहो।

रश्मि प्रभा said...

जादू है भावनाओं में.....

Dr.Bhawna said...

Bahut khub..

SWAPN said...

aapki sabhi rachnaon men gagar men sagar hai.bahut achchi lagin . badhaai

Suchreet said...

Bohot achhe dost.....badhiya hai....

Text selection Lock by Hindi Blog Tips
विजेट आपके ब्लॉग पर