मन के बाग़ में बिखरी है भावनाओं की ओस। …………कुछ बूंदें छूकर मैंने भी नम कर ली हैं हथेलियाँ …………और लोग मुझे कवि समझने लगे!

ईनाम मिले

हमको ये ईनाम मिले
अपनों से इलज़ाम मिले
जो मौक़े पर धोखा दें
ऐसे यार तमाम मिले
रूह बेचकर शाह बना
उसको अच्छे दाम मिले
सालों साल प्रतीक्षा की
तब शबरी को राम मिले
हर दिन ये उम्मीद रखी
शायद कल आराम मिले

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