मन के बाग़ में बिखरी है भावनाओं की ओस। …………कुछ बूंदें छूकर मैंने भी नम कर ली हैं हथेलियाँ …………और लोग मुझे कवि समझने लगे!

बचपन

हंसी-ख़ुशी के वो लमहे हज़ार बचपन के
ए काश लौटते दिन एक बार बचपन के
नहीं दिमाग न थे होशियार बचपन के
तभी तो दिन थे बड़े खुशगवार बचपन के
बड़े हुए तो कई लोग मिल गए लेकिन
बिछड़ चुके हैं सभी दोस्त-यार बचपन के
जो जिस्म को नही दिल को सुकून देते थे
बहुत अजीब थे वो रोज़गार बचपन के
सुबह लड़े तो शाम फिर से साथ खेल लिए
कभी रहे नहीं मन में गुबार बचपन के
सभी को चुपके से हर राज़ बता देते थे
सभी तो हो गए थे राज़दार बचपन के
ढले जो शाम तो गलियों में खेलने निकलें
बड़े हसीन थे वो इंतज़ार बचपन के
बड़ों पे ज़िद रही छोटों पे इक रुआब रहा
कहाँ बचे हैं अब वो इख्तियार बचपन के
ज़हन में कौंध के होंठों पे बिखर जाते हैं
वो वाकयात हैं जो बेशुमार बचपन के

6 comments:

रचना गौड़ ’भारती’ said...

सुंदर रचना
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहि‌ए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
www.zindagilive08.blogspot.com
आर्ट के लि‌ए देखें
www.chitrasansar.blogspot.com

islamicwebdunia said...

ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर…आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

नारदमुनि said...

koi louta de mere bachapan ko,narayan narayan

Abhishek said...

ज़हन में कौंध के होंठों पे बिखर जाते हैं
वो वाकयात हैं जो बेशुमार बचपन के

बहुत सुंदर भाव. स्वागत.

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है फिर से बचपन याद आ गया।धन्यवाद।

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