मन के बाग़ में बिखरी है भावनाओं की ओस। …………कुछ बूंदें छूकर मैंने भी नम कर ली हैं हथेलियाँ …………और लोग मुझे कवि समझने लगे!

बँटवारा

जब से आंगन में हुए, दीवारों के ठाठ।
तब से मंहगे हो गए, छोटे-छोटे बाट॥

1 comment:

रश्मि प्रभा said...

do panktiyon me bahut kuch samaya hota hai...

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