मन के बाग़ में बिखरी है भावनाओं की ओस। …………कुछ बूंदें छूकर मैंने भी नम कर ली हैं हथेलियाँ …………और लोग मुझे कवि समझने लगे!

कारण

भीतर तक दहल गया हूँ मैं
क्योंकि जानता हूँ
कि छोटी-मोटी वजह से
नहीं बदल सकता
तुम्हारा बर्ताव!

लेकिन नहीं जानता
कि आख़िर
क्या है
वो बहुत बड़ी वजह
जो अचानक
ख़ामोश हो गए हो तुम!

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