मन के बाग़ में बिखरी है भावनाओं की ओस। …………कुछ बूंदें छूकर मैंने भी नम कर ली हैं हथेलियाँ …………और लोग मुझे कवि समझने लगे!

वरुण गांधी

वरुण गांधी प्रकरण को सुनने के बाद
मुझे मेनका गांधी की ग़लती बहुत साल रही थी
क्योंकि जब वरुण को बोलने की तमीज़ सिखानी थी
तब मेनका जी कुत्ते-बिल्ली पाल रही थी
अब उनके पाले हुए जंतु तो राजनीति कि गलियों में
मस्ती से डोल रहे हैं
औए बेचारे वरुण
संस्कारों के अभाव में
पशुता की भाषा
बोल रहे हैं

पाप

सिर्फ मतलब के लिए हर चाल चलना पाप है
हर दफ़ा दर देखकर मजहब बदलना पाप है
शायरी, दीवानगी, नेकी, इबादत, मयक़शी
और राहे-इश्क़ में गिर कर संभलना पाप है
काश बच्चों की तरह हालात भी ये जान लें
ख़्वाहिशों की तितलियों के पर मसलना पाप है
दौर इक ऐसा भी था, जब झूठ कहना मौत था
और अब ये हाल, सच की राह चलना पाप है
किस डरौने दौर में हम जी रहे हैं या ख़ुदा
घर में रहना ऐब है, घर से निकलना पाप है
पाप का दिल से निकल हरक़त में आना ज़ुर्म है
ज़ुर्म का भीतर ही भीतर दिल में पलना पाप है

गुमनामी

कुछ ज़र्द से पत्ते थे जो सज कर सँवर गए
कुछ फूल जंगलों में ही खिल कर बिखर गए
कुछ छाछ की छछिया लिए दुनिया पे छा गए
कुछ खीर हाथ में लिए घुट-घुट के मर गए

माँ मैंने अक्सर देखा है

माँ मैंने अक्सर देखा है
तुमको कोरें गीलीं करते
चौके में ही खड़ी-खड़ी तुम
चुपके-चुपके रो लेती हो
जब चकले पर एक चपाती
बेलन से बिलने लगती है
ऑंसू की दो बूंदें टप-टप
छलक-छलक कर गिर पड़ती हैं
चकले वाली गोल चपाती
गरम तवे पर चढ़ जाती है
फिर थोड़ा सा आटा लेकर
नई चपाती कर लेती हो
एक चपाती गरम तवे पर
एक चपाती चकले ऊपर
एक चपाती चुपड़ी करके
चौके से बाहर आती हो
"ये तो ले लो!
सब्ज़ी लाऊँ?
पापड़ भूनूँ?
लौंजी दे दूँ?"
-कहते कहते एक चपाती
थाली में सरका जाती हो
फिर सब्ज़ी ले कर आती हो
एक हाथ में करछी पकड़े
कमरे की चौखट से सट कर
कहती हो- "सब ठीक बना है?
गरम मसाला कम डाला है।
बच्चों को नुक़सान करेगा।"
सब टीवी में डूबे-डूबे
हुंकारा सा भर देते हैं
तुम चौके में वापस जाकर
एक चपाती गरम तवे की
एक चपाती चकले वाली
एक चपाती बच कर लौटी
सेंक-साक कर, रुखी-चुपड़ी
इक थाली में रख लेती हो
ले कर कमरे में आती हो
फिर जा कर पानी लाती हो
फिर अपना खाना खाती हो
तब दोनों ऑंखों की कोरें
फिर गीलीं होने लगती हैं
तभी याद आता है तुमको
"अरे! गैस पर दूध रखा है
उफन जाएगा!
मंदा कर दूँ...."

नव वर्ष

इक और नया अवसर आया
ख़ुशियों के पुष्प खिलाने का
अंतस् की सब कटुता तजकर
अपनों को गले लगाने का
मन में जागे उल्लास नया
जीवन में हो मधुमास नया
उलझे-सुलझे संबंधों में
फिर से पनपे विश्वास नया
मुस्कानों की कलियाँ चटकें
हर दिल में निस्पृह प्रीत उठे
पावनता नयनों में उतरे
मन में मधुरिम संगीत उठे
हर जीवन के वातायन में
चंदन बन महके नया साल
आशाओं के नन्दन वन में
चिड़िया सा चहके नया साल

सपनों का कॅनवास

मैं खुली आँखों से
एक सपना देखता था अक्सर
बनाता था इक तस्वीर
अपनी ख्वाहिशों की
न जाने कब उभर आया
एक मुक़म्मल इंसान
मेरे मन के कॅनवास पर
न जाने क्यों
मैंने रख दिया
अपना दिल
बिना सोचे-समझे
इस इंसान के सीने में

...तुम
महज एक रिश्ता नहीं हो मेरे लिए
तुम मेरे सपनों का
कॅनवास हो

संवेदनाओं की आड़ में

पहले भी करते रहे हैं लोग
मेरा उपयोग
'इस' या 'उस' के लिए!

पहले भी कई बार झुंझलाया हूँ मैं
स्वयं पर
किसी 'अपने' के द्वारा
छले जाने के बाद

पहले भी मैं ख़ुद से बतियाता रहा हूँ
…कि आँखें झूठ नहीं बोलतीं
…कि मेरी सच्चाई का साक्षी है ईश्वर
…कि शायद कोई समझता है
मेरे हिस्से के सच को
…कि नहीं छला जा सकता
किसी को
भावनाओं के नाम पर...!

शायद तुम
पहले भी मिल चुके हो मुझे
संवेदना की आड़ में!

मन की अदालत

एक ही पल में
उभर आए
कई सारे शिक़वे
ढेर सारे ग़िले
और फिर
अगले ही पल
मैंने ख़ुद-ब-ख़ुद
बेकार साबित कर दिया उन्हें
अपने मन की अदालत में

....ऐसा नहीं था
कि सचमुच
बेकार थी मेरी शिक़ायतें
बल्क़ि सच तो यह है
कि मैं
मुहब्बत करता हूँ
तुमसे!

सही उत्तर

यूँ ही पूछ बैठी थी तुम
'मेरे बिना रह पाओगे?'

-सुनकर
मेरे मस्तिष्क में
एकाएक कौंध गया एक प्रश्न-
'क्या तुम सही उत्तर सह पाओगी?'

...ख़ुद से उलझते-जूझते
न जाने कब
मेरे मुँह से निकल गया-
'नहीं!'

...और तुमने
इसे अपने प्रश्न का
उत्तर समझ लिया!

दीपक

ये अंधेरा दिए से डरता है
या फ़क़त एहतराम करता है
वो भी दीपक ही है जो सारा दिन
रात होने की दुआ करता है

नैन बरसते हैं

भीतर-भीतर मन गलता है, बाहर नैन बरसते हैं 
बीते पल आँखों के आगे, हर पल हलचल करते हैं 
टूटन, आह, चुभन, सिसकन में जीवन घुलता जाता है
लोग किसी के बिन जी लेना कितना सहज समझते हैं

एक ही प्रश्न

हर रात
मैं बुनता था इक ख़्वाब
और फिर
उसको अधूरा छोड़
चुपचाप सो जाता था
कि जब वक़्त आएगा
तो तुम्हारे साथ
पूरा करूंगा
ये ख़ूबसूरत ख़्वाब…

एक-एक करके
न जाने कितने ही ख़्वाब
इकट्ठे हो गए
मेरे तकिए के नीचे।

आज जब सोने लगा मैं
बिना संजोए कोई ख़्वाब
तो अचानक
तकिए के नीचे से निकल
मेरे सामने खड़े हो गए
हज़ारों अधूरे ख़्वाब।
सबकी भंगिमा में मौजूद था
एक ही प्रश्न-
"अब हमारा क्या होगा?"

मैंने कहा-
"यही तो
मैं भी सोच रहा हूँ…"

अखरता है

भले ही कभी दुलारा न हो
मुझे आपके नेह ने
बाँहों में भरकर!
…लेकिन फिर भी
न जाने क्यों
काटने को दौड़ता है मुझे
आपका मौन!!!

गिला

है अगर वो ग़ैर तो कैसा गिला
और अगर अपना है तो फिर क्या गिला
वो मरासिम फिर कहाँ क़ायम रहा
जिसमें पनपा हो कभी शिक़वा-गिला
वो हमें इलज़ाम देते रह गए
और हम सुनते रहे उनका गिला
ज़ख़्म सारे वक़्त भर देगा मगर
बच ही जाएगा कहीं थोड़ा गिला
तुम मेरी राहों पे चल कर देख लो
लापता हो जाएगा सारा गिला

हमारी धरोहर

ओलम्पिक, ऑस्कर
और विज्ञान के बाद
अब हम भ्रष्टाचार में हाथ आजमाएंगे
और अपने देश को
इस क्षेत्र में
नम्बर वन बनाएंगे
भ्रष्टाचार हमारी सांस्कृतिक परम्परा है
हमारे पुरखों की थाती है
मीर ज़ाफ़रों, जयचन्दों और
वीरभद्रों की मेहनत पर कीचड़ उछालते
तुम्हें शर्म नहीं आती है
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट ने
हमारी आत्मा को ठेस पहुंचाई है
भ्रष्ट राष्ट्रों की फेहरिस्त में
हमें सत्तरवें स्थान पर रखकर
हमारे अफ़सरों, ठेकेदारों, राजनेताओं
और पुलिसवालों पर उंगली उठाई है
इस रिपोर्ट को पढ़कर
हमारे देशवासियों की आत्मा जाग गई है
ईमानदारी की चादर में लिपटी निद्रा
भाग गई है
अब जल्दी ही हर ओर
बेईमानी का बोलबाला होगा
हर सफल आदमी का
बैकग्राउंड काला होगा
संसद के आसपास बरसों से लगी
ऊबसूरत मूर्तियां हटाई जाएंगीं
और उनकी जगह
हर्षद मेहता और मोनिंदर पंडेर की
ख़ूबसूरत मूर्तियां लगाई जाएंगीं
बाबा अम्बेडकर अपने संविधान के साथ
विदाई लेंगे
उनकी जगह तेलगी जी
स्वप्रकाशित स्टॅम्प पेपर लिए दिखाई देंगे
महात्मा गांधी के स्थान पर
नटवर लाल का चित्र होगा
वही व्यक्ति महान समझा जाएगा
जिसका काला चरित्र होगा
'सत्यमेव जयते' के आधार पर
अब नहीं खेली जाएगी
सिध्दांतों की चैस
पूरे देश का एक ही सिध्दांत होगा
जिसकी लाठी उसकी भैंस
स्कूली बच्चों को
'जुगाड़' और 'घोटालों' का पाठ पढ़ाया जाएगा
हॉस्पीटलों में मरीज़ों को
ख़ून की जगह
ठर्रा चढ़ाया जाएगा
जाली नोट छापना
कुटीर उद्योग होगा
सच बोलने का प्रयास
एक रोग होगा
लूटपाट, धोखाधड़ी, और
कालाबाज़ारी के आधार पर
नया इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा होगा
हफ्तावसूली जैसे सम्माननीय कार्यों के दम पर
देश का नाम बड़ा होगा
हमें ईमानदार कहने वालों को
हम मुंहतोड़ जवाब देंगे
अब हम भारत के लोग
भारत को
एक भ्रष्टसत्ता सम्पन्न
सम्पूर्ण जुगाड़वादी
लूटतंत्रात्मक
गनराज्य बनाने के लिए
हर संभव प्रयास करेंगे

अनकहा

सदियों से
तलाश रहा हूँ मैं
एक ऐसा श्रोता
जो सुन सके
मेरी कविताओं का वह अंश
जो मैंने कहा ही नहीं

क्योंकि
'बहुत कुछ'
कह देने की संतुष्टि से
कहीं बड़ी है
बेचैनी
'कुछ'
न कह पाने की!

कारण

भीतर तक दहल गया हूँ मैं
क्योंकि जानता हूँ
कि छोटी-मोटी वजह से
नहीं बदल सकता
तुम्हारा बर्ताव!

लेकिन नहीं जानता
कि आख़िर
क्या है
वो बहुत बड़ी वजह
जो अचानक
ख़ामोश हो गए हो तुम!

क़ुसूर

सज़ाओं में मैं रियायत का तलबदार नहीं
क़ुसूरवार हूँ कोई गुनाह्गार नहीं
मैं जानता हूँ कि मेरा क़ुसूर कितना है
मुझे किसी के फ़ैसले का इंतज़ार नहीं

बुरा न मानो होली है…

अब ऐसे मनने लगा, होली का त्यौहार।
चेहरे स्याह-सफेद हैं, रंगे हुए अख़बार॥

भूले से भी मत करो, पॉवर का मिस-यूज़।
भस्म हो गई होलिका, उड़ा पाप का फ़्यूज़॥

वोट-पर्व से यूँ मिला, रंगों का त्यौहार।
देवदूत के रंग में, रंग गए चंद सियार॥

किंगफ़िशर पर चढ़ गया, देश-प्रेम का रंग।
राजघाट पर रोज़ अब, घुटा करेगी भंग॥

सिर्फ़ स्वदेशी माल से, अब कमाएंगे नोट।
बीयर-व्हिस्की छोड़ कर, ठर्रा करो प्रमोट॥

पहुँच

किसी की ज़िन्दगी अपने ठिकाने तक नहीं पहुँची
किसी की मौत भी वादा निभाने तक नहीं पहुँची
बुजुर्गों की क़दम-बोसी मेरी फ़ितरत रही लेकिन
मेरी हिम्मत कभी उनके सिराहने तक नहीं पहुँची
ज़माने के लिए जो शख्स घुट-घुट कर मरा आख़िर
ख़बर उस शख्स की जालिम ज़माने तक नहीं पहुँची
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